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सोमवार, जून 20, 2022

प्रेम जनमेजय को पंडित माधव राव स्प्रे छत्तीसगढ़ मित्र साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान!



 

साहित्य व विचार पर केंद्रित मासिक पत्रिका'छत्तीसगढ़-मित्र' एवं हिंदुस्तानी भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन को समर्पित स्वयंसेवी संस्था'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' के संयुक्त प्रयास से,दिल्ली के हिंदी भवन में,कल दिनाँक 19-06-2022 को,एक कार्यक्रम किया गया।यह कार्यक्रम-'छत्तीसगढ़ मित्र' के संस्थापक संपादक पंडित माधव राव स्प्रे की 150वीं जयंती के समापन पर किया गया।
इस अवसर पर,साहित्य की व्यंग्य विधा को समर्पित त्रैमासिक पत्रिका'व्यंग्य यात्रा ' को'पंडित माधवराज स्प्रे छत्तीसगढ़ मित्र साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान'से नवाजा गया। 'व्यंग्य यात्रा'की ओर से,यह सम्मान स्वीकार करते हुए पत्रिका के संपादक-प्रेम-जनमेजय ने कहा कि-यह इस पत्रिका के सहयात्रियों और शुभचिंतकों की शुभकामनाओं का फल है। इस समारोह में-ममता कालिया, प्रदीप ठाकुर त्रिलोक दीप ,सुशील त्रिवेदी, अशोक माहेश्वरी, अभिषेक अवस्थी गिरीश पंकज, सुधीर शर्मा, सुधाकर पाठक, तृषा शर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकार, कवि,लेखक, पत्रकार,भाषाविद व साहित्य प्रेमी मौजूद थे।
   प्रेम जनमेजय ने,उपस्थित सभी साहित्यिक मित्रों का आभार प्रकट करते हुए,यह भी कहा कि  यह सम्मान उनका नहीं, व्यंग्य यात्रा के सभी शुभचिंतकों का है। यह सम्मान एक भिक्षुक का सम्मान है।इस अवसर पर,'हिंदी भाषा पर केंदित,उनकी पुस्तक  'हिंदी का राष्ट्र और राष्ट्र की हिंदी' का भी लोकार्पण किया गया।
इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य, शिक्षा और समाज के संदर्भ में 'भारतीयता और विश्वबोध' को लेकर,एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन इस अवसर पर  किया गया था,जिसमें,अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।
मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित-वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि-भारतीय संस्कृति,भाषा, राष्ट्रीय चेतना को जगाने में,जिन महान विभूतियों का सबसे ज्यादा योगदान रहा उनमें, महात्मा गांधी, महावीर प्रसार द्विवेदी और पंडित माधवराव राव स्प्रे का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है। माधवराव जी ने वर्ष-1900 में'छत्तीसगढ़ मित्र' की शुरुआत की,जब न तो देश स्वतंत्र था और न ही प्रकाशन की आज जैसी सुविधाएं थीं।पत्रिका के संपादक होने के नाते,उसके लिए सामग्री जुटाना, कितना कठिन रहा होगा।
वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर ने कहा कि स्प्रे जी का जीवन केवल 55 वर्ष का था,लेकिन अपने इस छोटे से जीवनकाल में भी पत्रकारिता व भाषा के क्षेत्र में  उन्होंने अतुलनीय योगदान दिया।डॉ मैनेजर पांडेय ने उनके उनके लेखन पर अद्भुत कार्य किया है।
डॉ सुशील त्रिवेदी का कहना था कि पंडित माधवराव स्प्रे जी ने धर्म,अध्यात्म और विचारधारा से आगे जाकर,भारत को विश्वबोध करवाया। गिरीश पंकज ने कहा की भारतीयता में,वसुधैव कुटुम्बकम की भावना पहले से ही समाहित है।आज कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग,भारतीयता की इस भावना को आहत कर रहे हैं।इनसे हमें सावधान रहने की आवश्यकता है।
'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' के अध्यक्ष सुधाकर पांडेय ने कहा कि कोई भी भाषा केवल विचारों का आदान प्रदान करने का माध्यम मात्र नहीं होती,वह उस समुदाय की सभ्यता व संस्कृति की भी वाहक होती है।आज भारतीय भाषायें लुप्त होती जा रहीं हैं।यदि हमारी भाषायें बचेंगी, तो हमारी संस्कृति भी बचेगी।आज भारतीयता को यदि बचाना है,तो हमें हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का न केवल संरक्षण, बल्कि संवर्धन भी करना पड़ेगा। हमारी अकादमी पिछले अनेक वर्षों से,अपने सीमित संसाधनों के बावजूद, यह कार्य लगातार कर रही है।
इस अवसर पर  कई अन्य पुस्तकों का लोकार्पण व  एक कवि-गोष्ठी का भी आयोजन किया गया,जिसमें दिल्ली,छत्तीसगढ़ व अन्य राज्यों से पधारे,अनेक कवि-कवयित्रियों ने कविता पाठ किया,जिनमें शामिल थे-युक्ता राशि, विनोद पाराशर,डॉ संजीव कुमार,डॉ वनिता शर्मा,डॉ कविता कपूर,राजकुमार श्रेष्ठ, विजय कुमार,साकेत चतुर्वेदी, नीरज,गोपाल सिंह, अनुराधा द्विवेदी, नैना देवी,संध्या श्रीवास्तव आदि।
इस अवसर  के कुछ चित्र,यहॉं साझा किये जा रहे हैं।




मंगलवार, अक्टूबर 19, 2021

'कल्लू मामा'का 'आगमन'की ओर से सम्मानU




गत रविवार, दिनाँक 17-10-2021 को,रोहिणी:दिल्ली के'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' सभागार में,साहित्यिक संस्था'आगमन'की ओर से वरिष्ठ व चर्चित व्यंग्यकार श्री सुभाष चंदर उर्फ 'कल्लू मामा'को विशिष्ट सम्मान दिया गया।सुभाष चंदर की अभी तक,व्यंग्य साहित्य की 47 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।'कल्लू मामा जिंदाबाद' भी उनके चर्चित व्यंग्यात्मक लेखों का संग्रह है।उनकी प्रसिद्धि का आलम यह है कि, अब लोग उन्हें'कल्लू मामा'के नाम से बुलाने लगे हैं।उन्हें संस्था की 'काव्य-संगोष्ठी'में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अकादमी के संस्थापक-सुधाकर पाठक ने की।विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्यकार श्री सुमोद सिंह चरौरा,श्रीमती सूक्ष्मलता महाजन,श्री अशोक गुप्ता, डॉ महेंद्र शर्मा'मधुकर' व डॉ नीलम वर्मा मौजूद थे।
कॅरोना-काल के उपरांत, आगमन की इस काव्य-संगोष्ठी में,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा उसके आस-पास के राज्यों से पधारे 30 से भी अधिक कवि व कवयित्रियों ने अपनी श्रृंगार,राष्ट्र-प्रेम व हास्य-व्यंग्य से ओत प्रोत कवितायें पढ़ी।कविता पाठ करने वालों में शामिल थे-स्वीट एंजेल, मनीषा जोशी,इंदु निगम, राजेन्द्र निगम,तरुणा पुंडीर, इंदु मिश्रा, मीनाक्षी भसीन,डॉ महेंद्र शर्मा मधुकर, सीमा अग्रवाल, सरोज शर्मा,डॉ पूजा कौशिक,कंचन पाठक,पंकज सिंह चावला,कंचन गुप्ता,बी.के.शोभा,अजय अक्स,,कमर बदरपुरी,भास्कर आनंद, दीपा गुप्ता, अमित गुप्ता, राजेन्द्र महाजन,स्वदेश सिंह चिरोरा, शिव नारायण,अवधेश कनोजिया, आकांक्षा, भारती विभूति ओमप्रकाश कल्याणे, सुंदर सिंह,सीमा सागर,विनोद पाराशर व कई अन्य कवि व कवयित्रियाँ।
मुख्य अतिथि श्री सुभाष चंदर को वैसे तो हम एक व्यंग्यकार के रूप में ही जानते हैं, लेकिन इस काव्य-संगोष्ठी में संवेदनशील कवि के रूप में भी उन्हें देखने का मौका मिला।
अपनी'बूढे लोग!' कविता में वरिष्ठ जनों के एकाकीपन की पीड़ा को,उन्होंने जिस मार्मिकता से व्यक्त किया , उसे सहज ही समझा जा सकता है।उनकी कविता की पंक्तियाँ थी-
बूढ़े लोग!
आत्महत्या तो कर सकते हैं
लेकिन-प्रेम नहीं कर सकते!
'प्रेम'उनके लिए
एक अश्लील कृत्य है!
कविता पाठ के अलावा, इस अवसर पर डॉ महिंदर मधुकर, इंदू मिश्रा किरण, डॉ पूजा कौशिक की पुस्तकों व सूक्ष्मलता महाजन के व्यक्तित्व व कृतित्व पर केन्दित पत्रिका'ट्रू मीडिया'के विशेषांक का भी लोकार्पण किया गया।
लगभग 3-4 घन्टे तक चले,इस कार्यक्रम का कुशल संचालन कंचन पाठक ने किया।'आगामन' के संस्थापक श्री पवन जैन पिछले कई वर्षों से, वरिष्ठ कवियों व नवांकुरों को इस संस्था के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं,जो एक पुनीत कार्य है।धन कमाने की अंधी दौड़ में, जहाँ कुछ भी निःशुल्क मिल पाना लगभग असंभव है,वहीं पर सुधाकर पाठक जैसे साहित्य-प्रेमी व जुनूनी लोग, साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए,'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' की ओर से निःशुल्क स्थान उपलब्ध करवा रहे हैं।सभी साहित्यकारों की ओर से ऐसी महान विभूतियों को नमन है।


शनिवार, अगस्त 15, 2020

स्वतंत्रता दिवस पर'साधना टी.वी.पर कविता पाठ

        कल शाम 6.00 बजे,'साधना टी.वी' पर'सतमोला कवियों की चौपाल' के 611वें एपिसोड का प्रसारण किया गया।इस एपिसोड में मुझे भी अपनी कविताएँ सुनाने का अवसर मिला।श्रीमती मृदुला सिन्हा( वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व राज्यपाल गोवा) इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थीं।मेरे अलावा,जिन अन्य कवियों ने अपनी अपनी कविताएं पढ़ी,उनमें शामिल  थे-डॉ कीर्ति काले(अंतरराष्ट्रीय कवयित्री),सोनम आर्य(विलासपुर),यश जैन(दिल्ली),अनुराग प्रबल पटेल(गाज़ियाबाद), सुरेश कुमार जैन(हैदराबाद),आशु शर्मा(मुंबई),कृष्णा भीवानीवाला(कलकत्ता) और संजू सूर्यम ठाकुर(मैनपुरी)।कार्यक्रम का आयोजन, स्वतंत्रता दिवस की 74 वीं व 'सतमोला कवियों की चौपाल' की 16वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में किया गया था। 'सतमोला कवियों की चौपाल' कविताओं का एक मात्र कार्यक्रम है,जो पिछले 16 वर्ष से लगातार चल रहा है,इसके लिए कार्यक्रम के प्रोड्यूसर, प्रवीण आर्य बधाई के पात्र हैं।कार्यक्रम का संचालन-रजनी अवनी ने किया।






     









रविवार, अगस्त 06, 2017



6 अगस्त,2017 को,नई दिल्ली,कनाट प्लेस के 'ऑक्सफ़ोर्ड बुक सेंटर में 'लेखन व प्रकाशन कार्यशाला का आयोजन' माय बुक पब्लिकेशन' की  ओर से किया गया|इस कार्यशाला  को,मुख्य वक्ता के रूप में अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार  श्री लक्षमण राव जी ने संबोधित किया| यहाँ उल्लेखनीय है कि श्री राव ने आर्थिक रूप से संपन्न न होते हुए भी ,अपने अथक परिश्रम,लगन व दृढ़ निश्चय के बल पर,अभी तक 25 पुस्तकों का लेखन व  प्रकाशन किया है|श्री राव का कहना है कि सिर्फ साहित्यिक लेखन के सहारे, घर नहीं चलाया जा सकता ,इसलिए आज भी दिल्ली के 'हिंदी -भवन' के पास,पटरी पर वे अपनी  छोटी सी चाय की दुकान चला रहे हैं|
नये लेखकों के लिए उनका सन्देश है कि लेखन कर्म इतना सहज नहीं है,इसके लिए दृढ़ इच्छा-शक्ति,लगातार प्रयास व अध्ययन की आवश्यकता है|नयी पीढ़ी में धैर्य की  कमी है,उसे सब कुछ फटाफट  चाहिये| साहित्यिक लेखन में  तुरंत कुछ नहीं मिलता| इसके अलावा  राव जी ने लेखन के क्षेत्र से जुड़े,जीवन के अन्य खट्टे-मीठे अनुभवों को भी साझा किया | नये लेखकों ने,लेखन व प्रकाशन से सबंधित अनेक सवाल भी किये,जिनका उन्होन्हें बड़ी  सहजता से जवाब दिया|
इस अवसर पर श्री सुप्रीत अरोड़ा जी ने  ब्लॉग-लेखन से सबंधित जानकारी भी उपस्थित लेखक समुदाय को दी|

इस अवसर के कुछ अन्य झलकियां|


बुधवार, फ़रवरी 11, 2015







प्रवासी भारतीय कवयित्री ‘डा0शील निगम’ के सम्मान में
निर्गुट काव्य-संगोष्ठी’
8 फरवरी,2015 को नांगलोई,दिल्ली में’सुरभि-संगोष्ठी’ व ’हम साथ-साथ हैं’संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से  प्रवासी भारतीय कवयित्री ‘डा0शील निगम’ के सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री किशोर श्रीवास्तव जी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में किया। इस अवसर पर ’राष्ट्र-किंकर’के सम्पादक डा.विनोद बब्बर,‘जनता-टी.वी’ के श्री कृष्ण कुमार विद्यार्थी व मिडिया से जुड़े कई अन्य गण-मान्य व्यक्ति भी मौजूद थे। इस कवि-गोष्ठी में 25 से अधिक कवियों ने अपनी रचनाएँ पढी।
आजकल कविताएँ,गीत,गज़लें बहुत लिखी जा रही हैं।कवि-सम्मेलनों व गोष्ठियों में पढी भी जा रहीं हैं,लेकिन ऐसी कविताएँ,गीत या गज़लें बहुत कम हैं जो श्रोताओं पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। कुछ कवि अच्छा लिखते के बावजूद,अपनी रचना को ढंग से पढ नहीं पाते,जिससे रचना श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाती। प्रियंका राय एक ऐसी युवा कवयित्री है जो लिखती भी बढिया है और पढती भी बढिया है। इस गोष्ठी में जब उन्होंने अपनी कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ,अपने ही अंदाज में पढी,तो सभी श्रोता भावुक हो उठे-
’पग-पग कपट भरी राहों से, अब निकला नहीं जाता
माँ मुझको भाहों में भर ले,अब तो चला नहीं  जाता’
नरेश मलिक ने अपनी कविता में नारी की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा-
‘जो नदी की तरह बहती है
पर वह-किसी को कुछ न कहती है।
सुजीत शोकीन का कहना था-
‘जिंदगी यूँ गुजार दी हमने
चंद लम्हों पर वार दी हमने’
नथ्थी सिंह बधेल जी ने श्रोताओं के मन को ’ब्रज की होली’गाकर रंग दिया।
कविता भारद्वाज ने अपनी कविता में उस दुल्हन की व्यथा को व्यक्त किया जिसकी शादी एक सैनिक से हुई,जिसे शादी से अगले दिन ही,बार्डर पर ड्यूटी के लिए बुला लिया गया-
‘आई बारात मेरी धूम-धाम से
बैंड-बाजे बजे रह गये
‘चार बातें उनसे मैं कर न सकी’
राम श्याम हसीन, जिस खूबसूरती से लिखते हैं,उसी खूबसूरत अंदाज में पढते भी हैं।उनके एक चर्चित गीत की पंक्तियाँ-
‘बिन तुम्हारे जिन्दगी आधी सी है
गम भी आधा,खुशी आधी सी है’
शहरी जीवन की विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए सुशीला शिवचरण ने अपनी कविता में कहा-
‘सटे-सटे से घर यहाँ,कटे-कटे से लोग’
अपने अंधे स्वार्थ के लिए कुछ लोग छोटे-छोटे बच्चों का शोषण करते हैं। उन बच्चों की पीडा को दीपक गोस्वामी ने अपनी रचना में बडी ही मार्मिकता से प्रस्तुत किया-
‘जिनके हिस्से की मिट्टी बस उनके सपने बोने दो
अपने अंधे लालच को,बच्चे न भूखे सोने दो’
आज आदमी जीते जी मर रहा है।उसके जीवन में गम ही गम हैं। राम.के.भारद्वाज ने इस हकीकत को अपनी कविता में इस प्रकार व्यक्त किया-
‘मेरे कंधों पर मेरी लाश
है न अजीब-सी बात’
प्रेमिका के अपने साजन से मिलने की व्याकुलता को अपनी कविता में ‘विकास यशकिर्ति ने कुछ इस व्यक्त किया-
‘कुछ दूरी पर रह गया,जब साजन का गाँव
पायल गिर गयी टूट कर,लचका मेरा पाँव’
‘सीमा विश्वास’ ने अपनी कविता में आसमान को छूने की चाह व्यक्त की,तो ‘जितेन्द्र कुमार ने अपनी कविता में प्रिय को अपने दिल की बात बताने की सलाह दी। जिस कार्यक्रम का संचालन किशोर  श्रीवास्तव जी कर रहे हों,वहाँ हास्य-व्यंग्य की बौछार न हो, हो ही नहीं सकता। एक गज़ल में उनकी मासूमियत का अंदाज देखिये-
‘तुमने मुझको भुला दिया तो मैं क्या करता
गैरों ने दिल मिला लिया तो मैं क्य करता’
हास्य-व्यंगय के इसी अंदाज को डा-टी.एस.दलाल ने अपनी रचनाओं में जारी रखा।इस अवसर पर मनोज मैथली,असलम बेताब,राजीव तनेजा,गजेन्द्र प्रताप सिंह,विनोद पाराशर,बबली वशिष्ठ,पी.के.शर्मा,शशी श्रीवास्तव,मनोज भारत,दुर्गेश अवस्थी,पंकंज त्यागी,भूपेन्द्र राघव,संतोष राय, व राजकुमार यादव ने भी अपनी रचनाएँ पढीं।
इस अवसर पर कार्यक्रम की विशिष्ठ अतिथि डा.शीला निगम का सम्मान भी किया गया। राष्ट्र किंकर के संपादक व साहित्यकार डा.विनोद बब्बर,साहित्यकार श्याम स्नेही जी व जनता टी.वी.के श्री कृष्ण कुमार विद्यार्थी जी भी इस अवसर पर मौजूद थे। उनकी कविता की ये पंक्तियाँ उपस्थित लोगों के जहन में देर तक गूँजती रहीं-
‘आपसे प्यार हो गया कैसे
ये चमत्कार हो गया कैसे
प्यार को मैं गुनाह कहता था
लेकिन यह गुनाह हो गया कैसे’






रविवार, नवंबर 30, 2014

अंधेरे समय को चीरती-कुमार अम्बुज की कविताएँ






29 नवंबर,2014 को नयी दिल्ली के’गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान’में ’नव-सर्वहारा सांस्कृतिक मंच’ की ओर से चर्चित कवि’कुमार अम्बुज’ की कविताओं के एकल  कविता-पाठ का कार्यक्रम रखा गया।कार्यक्रम की अध्यक्षता-डा0कर्ण सिंह चौहान ने की।समकालीन दुनिया के संपादक श्री आनंद स्वरुप वर्मा तथा श्री शिवमंगल सिंह सिद्धांतकर भी इस अवसर पर मंच पर आसीन थे।
श्री रविन्द्र कुमार दास ने कवि कुमार अम्बुज का परिचय देते हुए कहा कि-उनके अभी तक पाँच कविता-संग्रह,एक कहानी संग्रह तथा गद्य की अन्य विधा में लिखी गयी अन्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।उनके कविता-संग्रह-
’किवाड़’,’क्रूरता’,’अन्तिम’,’अमीरी रेखा’ व ’कवि ने कहा’ की कई कविताएं काफी चर्चित रही हैं। देश की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
      देश के साहित्यकारों/सांस्कृतिक कर्मियों में’बाबा’ के नाम से चर्चित श्री शिव मंगल सिंह सिद्धांतकर ने मुख्य अतिथि कवि-’कुमार अम्बुज’ तथा अन्य गण-मान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि-कविता मानवता के प्रयायों में से एक है।दर-असल कविता उन सवालों का जवाब देती है,जिनका जवाब हमें कहीं से नहीं मिलता। बाबा ने आगे कहा कि अलग-अलग संगठन अंधेरे को चीरने के लिए,अलग-अलग तरह के औजारों का प्रयोग करते हैं।नव-सर्वहारा सांस्कृतिक मंच कविता को एक औजार के रुप में लेते हुए,अंधेरे को चीरने का प्रयास कर रहा है।
      अतिथि कवि ’कुमार अम्बुज’ने इस अवसर पर अपनी लगभग 25 से अधिक प्रतिनिधि व चर्चित कविताओं का पाठ-दिल्ली व उसके आस-पास के क्षेत्रों से पधारे प्रतिष्ठित साहित्यकारों,पत्रकारों व नवोदित कवियों व कवित्रियों की उपस्थिति में किया।उनकी कुछ चर्चित कविताएं हैं-’जाँच-पड़्ताल‘,‘भरी बस में लाल साफेवाला आदमी’,‘तुम्हारी जाति क्या है?’,‘जेब में सिर्फ दो रुपये’,‘नयी सभ्यता की मुसीबत’,’क्रूरता’,‘जो दर-असल हमारी बहनें थी’,‘कवि की अकड़’ और ’मेरा प्रिय कवि’।
      कुमार अंम्बुज की कविताएँ-बहुत ही सहज व सरल हैं। उनकी कविताओं में एक आम आदमी का दर्द है जो कभी ’भरी बस में लाल साफेवाला आदमी’ के रुप में मुखर होता है तो कभी’जेब में सिर्फ दो रुपये’देखकर। नारी की पीड़ा को भी अपनी कविताओं में उन्होंने बड़ी मार्मिकता से अभिव्यक्ति दी है। कवि के अकड़पन को,बिना किसी लाग-लपेट के,अपनी कविता’कवि की अकड़’ में बहुत ही सहजता से व्यक्त किया है।
      कार्यक्रम के दूसरे सत्र में-कुमार अंम्बुज से-उनकी कविताओं और उनकी रचना-प्रक्रियाँ को लेकर प्रश्न किये गये। कवयित्री’अंजु शर्मा ने प्रश्न उठाये कि वे नारी न होते हुए भी, नारी-पीड़ा को इतनी सहजता से अपनी कविताओं में कैसे व्यक्त करते हैं?आज  के समय की वे कौन सी चुनौतियाँ है जिनका कविता सामना कर रही है? वरिष्ठ कवि श्री मंगलेश डबराल ने कुमार अंम्बुज से उनकी’रचना-प्रक्रिया’ के संबंध में सवाल किया। उन्होंने बडी सहजता से,कभी सीधे-सीधे तो कभी कविता के रुप में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दिये।
      अंत में,अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में –डा0कर्ण सिंह चौहान ने कहा कि यह कहना एकदम गलत है कि पाठक के मन में कविता की जिज्ञासा कम हुई है।केवल कवि ही सभी चीजें तय नहीं करता,समय भी कई चीजों को तय करता है।आज हमारे कहने और करने में कोई संबंध नहीं रह गया है। जो कविताएं लिखी जा रही हैं वे सकारात्मक-बोद्य से उपजी कविताएं न होकर,आक्रोश में लिखी गयी कविताएं हैं।
      इस कार्यक्रम की कुछ अन्य तस्वीरें

शनिवार, मई 17, 2014

फेस-बुक मैत्री संगोष्ठी-2014

फेस-बुक तकनीक का उच्चतम शिखर है। यह एक ऐसी खिड़की है जिससे विश्वदर्शन किये जा सकते हैं। अब खिड़की है तो ताजी हवा,धूप के साथ-साथ,धूल,मिट्टी भी आयेगी ही।यदि विवेक से काम लेकर इस खिड़की पर पर्दा लगा लें,तो अनावश्यक कूड़े-कचरे से बचा जा सकता है।’-ये विचार राष्ट्र किंकर के संपादक श्री विनोद बब्बर जी ने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर दिल्ली नांगलोई में दिनांक 14-05-2014 को आयोजित एक कार्यक्रम में व्यक्त किये।
‘फेस-बुक-मैत्री-संगोष्ठी-2014’ का आयोजन-’हम सब साथ-साथ ,’प्रथम क्रिएशन व ’सुरभि’ के सौजन्य से किया गया। इस अवसर पर देश के कोने-कोने से आये लगभग 40 से अधिक फेस-बुक के माध्यम से जुड़े मित्रों ने अपने अपने अनुभवों को साझा किया। फेस-बुक से जुडे खट्टे-मीठे अनुभवों को लेकर एक प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी,जिनमें से पाँच अनुभवों को पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार प्राप्त करने वाले मित्र थे:-
1.संजना तिवारी(आध्र-प्रदेश)
2.पूनम माटिया
3.राम.के.भारद्वाज
4.निवेदिता मिश्रा
5.जगत(दतिया)

इसके अलावा अन्य  लगभग 25 फेस-बुक मित्रों को फेस-बुक पर अपनी सक्रियता बनाये रखने के लिए सह-भागिता प्रमाण-पत्र भी वितरित किये गये। इस अवसर पर व्यंग्य कविता में सुपरिचित हस्ताक्षर डा.सरोजनी प्रीतम, गजलकार विजय गुरदासपुरी,फिल्म व धारावाहिक लेखिका श्रीमती  रेखा बब्बल भी उपस्थित थी। डा.सरोजनी प्रीतम ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-व्यक्ति युवा मन से होता है। कवि हमेशा युवा रहता है। हमारा शब्दों का खेल है।मैंने हमेशा शब्दों से खिलवाड़ किया है उन्होंने इस अवसर पर अपनी व्यंग्य कविता पढी-
लो भी
लो भी
जब ले लिया
तो कहते हैं

लोभी।