गत रविवार, दिनाँक 17-10-2021 को,रोहिणी:दिल्ली के'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' सभागार में,साहित्यिक संस्था'आगमन'की ओर से वरिष्ठ व चर्चित व्यंग्यकार श्री सुभाष चंदर उर्फ 'कल्लू मामा'को विशिष्ट सम्मान दिया गया।सुभाष चंदर की अभी तक,व्यंग्य साहित्य की 47 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।'कल्लू मामा जिंदाबाद' भी उनके चर्चित व्यंग्यात्मक लेखों का संग्रह है।उनकी प्रसिद्धि का आलम यह है कि, अब लोग उन्हें'कल्लू मामा'के नाम से बुलाने लगे हैं।उन्हें संस्था की 'काव्य-संगोष्ठी'में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अकादमी के संस्थापक-सुधाकर पाठक ने की।विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्यकार श्री सुमोद सिंह चरौरा,श्रीमती सूक्ष्मलता महाजन,श्री अशोक गुप्ता, डॉ महेंद्र शर्मा'मधुकर' व डॉ नीलम वर्मा मौजूद थे।
कॅरोना-काल के उपरांत, आगमन की इस काव्य-संगोष्ठी में,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा उसके आस-पास के राज्यों से पधारे 30 से भी अधिक कवि व कवयित्रियों ने अपनी श्रृंगार,राष्ट्र-प्रेम व हास्य-व्यंग्य से ओत प्रोत कवितायें पढ़ी।कविता पाठ करने वालों में शामिल थे-स्वीट एंजेल, मनीषा जोशी,इंदु निगम, राजेन्द्र निगम,तरुणा पुंडीर, इंदु मिश्रा, मीनाक्षी भसीन,डॉ महेंद्र शर्मा मधुकर, सीमा अग्रवाल, सरोज शर्मा,डॉ पूजा कौशिक,कंचन पाठक,पंकज सिंह चावला,कंचन गुप्ता,बी.के.शोभा,अजय अक्स,,कमर बदरपुरी,भास्कर आनंद, दीपा गुप्ता, अमित गुप्ता, राजेन्द्र महाजन,स्वदेश सिंह चिरोरा, शिव नारायण,अवधेश कनोजिया, आकांक्षा, भारती विभूति ओमप्रकाश कल्याणे, सुंदर सिंह,सीमा सागर,विनोद पाराशर व कई अन्य कवि व कवयित्रियाँ।
मुख्य अतिथि श्री सुभाष चंदर को वैसे तो हम एक व्यंग्यकार के रूप में ही जानते हैं, लेकिन इस काव्य-संगोष्ठी में संवेदनशील कवि के रूप में भी उन्हें देखने का मौका मिला।
अपनी'बूढे लोग!' कविता में वरिष्ठ जनों के एकाकीपन की पीड़ा को,उन्होंने जिस मार्मिकता से व्यक्त किया , उसे सहज ही समझा जा सकता है।उनकी कविता की पंक्तियाँ थी-
बूढ़े लोग!
आत्महत्या तो कर सकते हैं
लेकिन-प्रेम नहीं कर सकते!
'प्रेम'उनके लिए
एक अश्लील कृत्य है!
कविता पाठ के अलावा, इस अवसर पर डॉ महिंदर मधुकर, इंदू मिश्रा किरण, डॉ पूजा कौशिक की पुस्तकों व सूक्ष्मलता महाजन के व्यक्तित्व व कृतित्व पर केन्दित पत्रिका'ट्रू मीडिया'के विशेषांक का भी लोकार्पण किया गया।
लगभग 3-4 घन्टे तक चले,इस कार्यक्रम का कुशल संचालन कंचन पाठक ने किया।'आगामन' के संस्थापक श्री पवन जैन पिछले कई वर्षों से, वरिष्ठ कवियों व नवांकुरों को इस संस्था के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं,जो एक पुनीत कार्य है।धन कमाने की अंधी दौड़ में, जहाँ कुछ भी निःशुल्क मिल पाना लगभग असंभव है,वहीं पर सुधाकर पाठक जैसे साहित्य-प्रेमी व जुनूनी लोग, साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए,'हिंदुस्तानी भाषा अकादमी' की ओर से निःशुल्क स्थान उपलब्ध करवा रहे हैं।सभी साहित्यकारों की ओर से ऐसी महान विभूतियों को नमन है।
भारत की राजधानी हॆ-यह दिल्ली.भारत का लघु-रुप हॆ यह दिल्ली.अनेकताओं में एकता का शहर हॆ-दिल्ली . दिलवालों का शहर हॆ यह दिल्ली.पाश्चात्य व पश्चिमी संस्कृति का मिश्रण हॆ-यह दिल्ली.भारतीय राजनीति का अखाडा हॆ यह दिल्ली.न जाने कितनी बार उजडी व बसी यह दिल्ली.इस दिल्ली शहर के साहित्यकारों,पत्रकारों व ब्लागरों का एक सामूहिक मंच हॆ-यह ’दिल्ली ब्लागर्स एसोशिएशन.
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मंगलवार, अक्टूबर 19, 2021
'कल्लू मामा'का 'आगमन'की ओर से सम्मानU
रविवार, जनवरी 27, 2013
‘दोस्ती’ में है-साधारण और आम आदमी की कविता-जयप्रकाश मानस
मित्रों,
साधारण और आम आदमी की कविता
आँखे!
आदमी की नहीं
उल्लू की थीं
जो दो इंच गहरे गड्ढों में
धँसी हुई थीं
उसके गाल
कशमीरी सेब की तरह नहीं
काबुली छुआरे की तरह
पिचके हुए थे I
इन पंक्तियों में कवि की कविताई को जानने-परखने का प्रवेश-द्वार है I
यहाँ एक साधारण और आम आदमी का वह चित-परिचित बिंब है जो भारतीय स्वप्न और यथार्थ को हूबहू हमारे सामने रख देता है।आजादी के बाद हमारी आंकाक्षा थी कि आम आदमी की आँखों की अपनी चमक लौटे। यह विडंबना है कि वह उल्लू की आँखों में तब्दील हो चुकी हैं । आदमी का उल्लू में तब्दील हो जाना विकास के उस यथार्थ का बयान है जहाँ वह बाह्य और अंतः दोनों से इस जनतंत्र में पिछड़ गया है । यह कविता भारतीय विकास की आंकाक्षा और उसके हनन की भले ही साधारण-सी कविता है किन्तु इसी साधारणता और संप्रेषणीयता के बल कवि आम आदमी से बतियाता है,
उसकी माली हालत के बारे में बार बार बताकर उसे सोचने को मजबूर करता है ।
आज के जनतंत्र को ’आफिस की ये फाईले’
रोज रोज झूठलाती हैं । कवि बेचैन हो उठता है । दरअसल स्वतंत्रता के बाद की सारी कविताओं की मूल टोन भारतीय आजादी के स्खलन से उत्पन्न बेचैनी ही है । इस बेचैनी को भले ही हम कई तरहों से परिभाषित करें किन्तु सीधे-सीधे प्रजातंत्र की असफलता की ओर इशारा करता हैं जहाँ आम आदमी नगण्य हो चुका है और उसकी पूछ-परख की गांरटी देनेवाली सारी इकाईयां बदचलनी पर उतर आयी हैं ।ये कविताएं ऐसे दौर में हर बेचैन मन की आवाज बन जाती हैं । कवि दावा नहीं करता कि साधारण जन में व्याप्त बेचैनी को आप कविता ही कहें ।चाहे तो कहें । कागज पर उतरे ये शब्द पाठक में निश्चित ही वह संवेदना जगाते हैं जहाँ साधारण से साधारण पाठक कह उठता है –
‘मैं
बहुत
छोटा
और
ये
चेहरा-
बहुत बड़ा हो जाता है I’
बहुत बड़ा हो जाता है I’
‘आफिस की ये फाईलें’
शीर्षक की ये पंक्तियाँ याद दिलाती हैं कि जनतंत्र के कार्य-व्यापार पर तैनात हर शख्स खुद को छोटा नहीं समझेगा, और जनता को बड़ा,तब स्वतंत्रता का स्वप्न पूरा नहीं हो सकेगा । कवि को साफ-साफ पता है कि इसके लिए स्वतंत्रता को एक ही अर्थ से देखना होगा । स्वतंत्रता हर कवि की प्रथम आंकाक्षा होती है । सच्चे अर्थों में हर कवि स्वतंत्रता की आवाज बनकर प्रचलित राजनीति में अपना हस्तक्षेप करता है । सिर्फ सारे हालातों की तस्वीर रखकर नहीं मौसम की बदलाहट और मुक्ति का विश्वास दिलाते हुए-
‘मौसम
फिर बदलेगा
मत हो निराश I
मुक्ति मार्ग
लम्बा है,बीहड़ है
झाड़ हैं,काँटें हैं I’
‘दोस्ती’
की लगभग कविताएँ साधारण शिल्प में हैं । शायद इसलिए कि वे दोस्त जैसी सरल-तरल और सहज लगें । सहज भाव-भंगिमा की इन कविताओं के बाद प्रौढ़ कविताओं के साथ कवि जरूर हमारे समक्ष आयेंगे ।
शुभकामनाओं के साथ....
जयप्रकाश मानस
संपादक, www.srijangatha.com
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ारायपुर, छत्तीसगढ़492001
मो.-94241-82664
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पुस्तक: दोस्ती(कविता-संग्रह) मूल्य: 195 रुपये लेखक: विनोद पाराशर
प्रकाशक: यश पब्लिकेशंस
1/10753,गली नं.3,सुभाष पार्क,
नवीन शाहदरा,कीर्ति मंदिर के पास,
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