मंगलवार, अप्रैल 09, 2013

गाँव व शहर की कविता





6अप्रैल,2013की शाम,नयी दिल्ली के कनाट प्लेस में‘चाँद के जुलाहे’शीर्षक से एक काव्य -गोष्ठी का आयोजन किया गया।’गाँव व शहर’को केन्द्र में रखकर हिंदी व अंग्रेजी में कविताएं पढी गयी।पुरानी व नयी पीढी के कवि/कवियित्रियों ने अपनी कविताओं में गाँव व शहर के वातावरण को जीवंत कर दिया । ‘रति अग्निहोत्री’ के कुशल संचालन व श्री ‘त्रिपुरारी शर्मा’ के संयोजन के अंतर्गत 20 से अधिक रचनाकारों ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की।‘इन्दु सिंह’ ने अपनी कविता में गांव के भोले-भाले लोगों के ’निश्छल प्रेम’को अभिव्यक्ति दी,तो ‘कनुप्रिया’ ने शहर की कठोरता व निर्ममता को कविता का विषय बनाया।‘पूनम माटिया’ की चिंता है कि मशीनीकरण के इस दौर में कहीं आदमी अपनी आदमियत  खोकर,रोबोट में न बदल जाये।आईने के सामने देर तक  खडे रहते हुए महिलाओं को तो अक्सर देखा है,लेकिन आज की युवा पीढी भी आईने पर फिदा है।’मयंक मिश्रा’ की कविता की पंक्तियां थी’देर तक देखता रहता हँ-खुद को आईने में।’ भाई ‘रवि ठाकुर’ की कविता का शीर्षक था-’गाँव का दिन’। उनकी इस कविता में गांव की प्रात:काल की बेला का एक दृश्य देखिये-
गांव अभी सोकर जगा था
डाली पर पंछी बैठे थे
नाली पर बच्चे बैठे थे।
शहरों में जगह की बहुत कमी है। वे अपना शौक कैसे पूरा करें,जिन्हें पेड.-पौधों से प्रेम है।‘खुशबु’ ने बालकानी में जगह देखी और वहीं पर अपने गमले सजा दिये।‘विकास राणा’ की चिंता है कि आने वाले समय में ’चलता-फिरता आदमी दीवार सा रह जायेगा’।’आनंद’ने अपने गांव के ठंडे पानी के तालाब के किस्से अपनी कविता के माध्यम से सभी को सुनाए।’कृष्ण कान्त’जब कई वर्षों के बाद अपने गांव लौटे तो पुरानी स्मृतियों में खो गये। गांव से शहर की ओर पलायन करते समय मन में गम और खुशी दोनों ही तरह के भाव होते हैं।अनुपमा गर्ग की कविता की इन पंक्तियों का शायद यही भाव है-
’चला था मैं गांव से
आज मन हस रहा है
रो रहा है’
रति अग्निहोत्री पहुंच गयी मुरादाबाद की पीतलनगरी। अपनी कविता में उन्होंने पीतलनगरी के कामगारों के दर्द को बडी मार्मिकता से व्यक्त किया। काव्य गोष्ठी के अंतिम दौर में, अपनी कविता-‘यहां भी कभी गांव था’ लेकर पहुंचे विनोद पाराशर ने,शहरीकरण के प्रभाव में आ रहे गांवों के दर्द को अभिव्यक्ति दी।जिन अन्य कवि/कवियित्रियों ने इस अवसर पर अपनी रचनाएं पढीं,वे थे-मुदिता,प्रकृति,स्वाति चावला,आकांक्षा,अलसर,अरुण व शारिक असीम।
कार्यक्रम की अन्य झलकियाँ

 


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रविवार, फ़रवरी 24, 2013

एक शाम,बेटियों के नाम



नयी दिल्ली,सिरीफोर्ट आडिटोरियम के नजदीक ’एकेडमी आफ फाइन आर्ट एण्ड लिटरेचर’ में ’डायलाग्स’ कार्यक्रम के अन्तर्गत,24 फरवरी,2013 की शाम,एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में  प्रतिष्ठित व नवोदित 30 से अधिक कवि व कवियित्रियों ने’बेटियों’ पर केन्द्रित अपनी कविताएं पढ़ी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता-आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक श्री लीलाधर मंडलोई ने की। उन्होंने इस अवसर पर महाकवि निराला जी की भाव-पूर्ण रचना’सरोज-स्मृति’ के कुछ अंश पढकर सुनाये।कार्यक्रम के संयोजक श्री मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा कि समकालीन कविता में’बेटियों’ने अपनी जगह कैसे बनाई है?आज हमें यह देखना है।‘ईश्वर’ शीर्षक से उन्होंने अपनी कविता भी पढ़ी। मंच-संचालन का उत्तरदायित्व संभाला,दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर सुधा उपाध्याय ने।उन्होंने बेटियों के प्रति अपने भाव,कविता में इस प्रकार प्रकट किये-
’बेटियां स्वयं शुभकामनाएं होती हैं
घर के श्वेत श्याम आंगन को
फागुन में बदल देती हैं’
      बेटियों के प्रति प्रेम,भय,शंका,उनके पालन-पोषण के प्रति लोगों की दोहरी मानसिकता तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामनाएं-पढी गयी-लगभग सभी कविताओं का यही भाव था। कुछ नवोदित कवि/कवियित्रियों की कविताओं के भाव तो अच्छे थे,लेकिन कविता-पाठ की कला से अनजान होने के कारण,वे अपनी कविता के मर्म को श्रोताओं तक नहीं पहुँचा पाये। फिर भी,उनके प्रयास की सराहना तो की ही जानी चाहिए-ताकि उनका मनोबल बढ सके और वे कविता के प्रस्तुतीकरण में भी सुधार ला सकें।
      लीलाधर मंडलोई ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में-पढी गयी कविता पर,टिप्पणी करते हुए कहा कि-कविता लिखना और उसे पढना-दोनों अलग-अलग बाते हैं। हमें कविता लिखने के साथ-साथ,उसके पाठ का भी अभ्यास करना चाहिए।कविता से प्रेम करिये,उसके मन को भी पढिये।उन्होंने कहा कि अखबार की खबर और कविता में फ़र्क होता है।पढी गयी कुछ कविताओं में आवेश तो था,लेकिन तरलता नहीं थी।कविता में कवि-मन दिखाई देना चाहिए।

      जिन कवि/कवियित्रियों ने इस कार्यक्रम में अपनी कविताएं पढीं,उनमें से कुछ नाम हैं-विभा मिश्रा,अंजू शर्मा,रुपा सिंह,शोभा मिश्रा,शैलेश श्रीवास्तव,वंदना गुप्ता,कोमल,विपिन चौधरी,ममता किरन,संगीता शर्मा,अर्चना त्रिपाठी,शौभना,,अर्चना गुप्ता,भरत तिवारी,अजय’अज्ञात’,लक्ष्मी शंकर बाजपेयी,उपेन्द्र कुमार,शाहिद,श्री कान्त सक्सेना,राजेश्वर वशिष्ठ,गोकुमार मिश्रा,देवेश त्रिपाठी व अन्य ।


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रविवार, जनवरी 27, 2013

‘दोस्ती’ में है-साधारण और आम आदमी की कविता-जयप्रकाश मानस



मित्रों,
मेरा दूसरा कविता संग्रह’दोस्ती’ हाल ही में-’यश पब्लिकेशंस’ शाहदरा,दिल्ली से प्रकाशित हो रहा है। 4-10  फरवरी,2013 तक दिल्ली के प्रगति मैदान में होने जा रहे विश्व पुस्तक मेले में भी,प्रकाशक के बुक स्टाल पर यह पुस्तक उपलब्ध होगी। पुस्तक में शामिल की गयी कविताओं के संबंध में-वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रताप सहगल का आलेख आप पहले ही पढ चुके हैं। आज पढिये-साहित्यिक जगत में होने वाली हर हल-चल पर अपनी पैनी नजर रखने वाले,साहित्यिक ई-पत्रिका ’सर्जनगाथा’ के संपादक श्री जयप्रकाश मानस जी का ’दोस्ती’ पर यह आलेख।
साधारण और आम आदमी की कविता
आँखे!
आदमी की नहीं
उल्लू की थीं
जो दो इंच गहरे गड्ढों में
धँसी हुई थीं
उसके गाल
कशमीरी सेब की तरह नहीं
काबुली छुआरे की तरह
पिचके हुए थे I
इन पंक्तियों में कवि की कविताई को जानने-परखने का प्रवेश-द्वार है I यहाँ एक साधारण और आम आदमी का वह चित-परिचित बिंब है जो भारतीय स्वप्न और यथार्थ को हूबहू हमारे सामने रख देता है।आजादी के बाद हमारी आंकाक्षा थी कि आम आदमी की आँखों की अपनी चमक लौटे। यह विडंबना है कि वह उल्लू की आँखों में तब्दील हो चुकी हैं । आदमी का उल्लू में तब्दील हो जाना विकास के उस यथार्थ का बयान है जहाँ वह बाह्य और अंतः दोनों से इस जनतंत्र में पिछड़ गया है । यह कविता भारतीय विकास की आंकाक्षा और उसके हनन की भले ही साधारण-सी कविता है किन्तु इसी साधारणता और संप्रेषणीयता के बल कवि आम आदमी से बतियाता है, उसकी माली हालत के बारे में बार बार बताकर उसे सोचने को मजबूर करता है ।
आज के जनतंत्र को ’आफिस की ये फाईले’ रोज रोज झूठलाती हैं । कवि बेचैन हो उठता है । दरअसल स्वतंत्रता के बाद की सारी कविताओं की मूल टोन भारतीय आजादी के स्खलन से उत्पन्न बेचैनी ही है । इस बेचैनी को भले ही हम कई तरहों से परिभाषित करें किन्तु सीधे-सीधे प्रजातंत्र की असफलता की ओर इशारा करता हैं जहाँ आम आदमी नगण्य हो चुका है और उसकी  पूछ-परख की गांरटी देनेवाली सारी इकाईयां बदचलनी पर उतर आयी हैं ।ये कविताएं ऐसे दौर में हर बेचैन मन की आवाज बन जाती हैं । कवि दावा नहीं करता कि साधारण जन में व्याप्त बेचैनी को आप कविता ही कहें ।चाहे तो कहें । कागज पर उतरे ये शब्द पाठक में निश्चित ही वह संवेदना जगाते हैं जहाँ साधारण से साधारण पाठक कह उठता है –
‘मैं बहुत छोटा
और ये चेहरा-
बहुत बड़ा हो जाता है I’
‘आफिस की ये फाईलें’ शीर्षक की ये पंक्तियाँ याद दिलाती हैं कि जनतंत्र के कार्य-व्यापार पर तैनात हर शख्स खुद को छोटा नहीं समझेगा, और जनता को बड़ा,तब स्वतंत्रता का स्वप्न पूरा नहीं हो सकेगा । कवि को साफ-साफ पता है कि इसके लिए स्वतंत्रता को एक ही अर्थ से देखना होगा । स्वतंत्रता हर कवि की प्रथम आंकाक्षा होती है । सच्चे अर्थों में हर कवि स्वतंत्रता की आवाज बनकर प्रचलित राजनीति में अपना हस्तक्षेप करता है । सिर्फ सारे हालातों की तस्वीर रखकर नहीं मौसम की बदलाहट और मुक्ति का विश्वास दिलाते हुए-
‘मौसम  
फिर बदलेगा
मत हो निराश I
मुक्ति मार्ग
लम्बा है,बीहड़ है
झाड़ हैं,काँटें हैं I’
‘दोस्ती’ की लगभग कविताएँ साधारण शिल्प में हैं । शायद इसलिए कि वे दोस्त जैसी सरल-तरल और सहज लगें । सहज भाव-भंगिमा की इन कविताओं के बाद प्रौढ़ कविताओं के साथ कवि जरूर हमारे समक्ष आयेंगे ।
 शुभकामनाओं के साथ....
                            जयप्रकाश मानस
संपादक, www.srijangatha.com
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ारायपुर, छत्तीसगढ़492001
मो.-94241-82664

पुस्तक:     दोस्ती(कविता-संग्रह)       मूल्य:       195 रुपये          लेखक:     विनोद पाराशर
प्रकाशक:   यश पब्लिकेशंस
                  1/10753,गली नं.3,सुभाष पार्क,
                  नवीन शाहदरा,कीर्ति मंदिर के पास,
                  दिल्ली-110032 मो:09899938522
ई-मेल:      yashpublicationdelhi@gmail.com
वेबसाइड:   www.yashpublications.com