भारत की राजधानी हॆ-यह दिल्ली.भारत का लघु-रुप हॆ यह दिल्ली.अनेकताओं में एकता का शहर हॆ-दिल्ली . दिलवालों का शहर हॆ यह दिल्ली.पाश्चात्य व पश्चिमी संस्कृति का मिश्रण हॆ-यह दिल्ली.भारतीय राजनीति का अखाडा हॆ यह दिल्ली.न जाने कितनी बार उजडी व बसी यह दिल्ली.इस दिल्ली शहर के साहित्यकारों,पत्रकारों व ब्लागरों का एक सामूहिक मंच हॆ-यह ’दिल्ली ब्लागर्स एसोशिएशन.
शनिवार, सितंबर 28, 2019
रविवार, अगस्त 06, 2017
6 अगस्त,2017 को,नई दिल्ली,कनाट प्लेस के 'ऑक्सफ़ोर्ड बुक सेंटर में 'लेखन व प्रकाशन कार्यशाला का आयोजन' माय बुक पब्लिकेशन' की ओर से किया गया|इस कार्यशाला को,मुख्य वक्ता के रूप में अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार श्री लक्षमण राव जी ने संबोधित किया| यहाँ उल्लेखनीय है कि श्री राव ने आर्थिक रूप से संपन्न न होते हुए भी ,अपने अथक परिश्रम,लगन व दृढ़ निश्चय के बल पर,अभी तक 25 पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन किया है|श्री राव का कहना है कि सिर्फ साहित्यिक लेखन के सहारे, घर नहीं चलाया जा सकता ,इसलिए आज भी दिल्ली के 'हिंदी -भवन' के पास,पटरी पर वे अपनी छोटी सी चाय की दुकान चला रहे हैं|
नये लेखकों के लिए उनका सन्देश है कि लेखन कर्म इतना सहज नहीं है,इसके लिए दृढ़ इच्छा-शक्ति,लगातार प्रयास व अध्ययन की आवश्यकता है|नयी पीढ़ी में धैर्य की कमी है,उसे सब कुछ फटाफट चाहिये| साहित्यिक लेखन में तुरंत कुछ नहीं मिलता| इसके अलावा राव जी ने लेखन के क्षेत्र से जुड़े,जीवन के अन्य खट्टे-मीठे अनुभवों को भी साझा किया | नये लेखकों ने,लेखन व प्रकाशन से सबंधित अनेक सवाल भी किये,जिनका उन्होन्हें बड़ी सहजता से जवाब दिया|
इस अवसर पर श्री सुप्रीत अरोड़ा जी ने ब्लॉग-लेखन से सबंधित जानकारी भी उपस्थित लेखक समुदाय को दी|
इस अवसर के कुछ अन्य झलकियां|
बुधवार, फ़रवरी 11, 2015
प्रवासी भारतीय कवयित्री ‘डा0शील
निगम’ के सम्मान में
निर्गुट काव्य-संगोष्ठी’
8
फरवरी,2015 को नांगलोई,दिल्ली में’सुरभि-संगोष्ठी’ व ’हम साथ-साथ हैं’संस्थाओं के
संयुक्त प्रयास से प्रवासी भारतीय कवयित्री
‘डा0शील निगम’ के सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का
संचालन श्री किशोर श्रीवास्तव जी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में किया। इस अवसर पर
’राष्ट्र-किंकर’के सम्पादक डा.विनोद बब्बर,‘जनता-टी.वी’ के श्री कृष्ण कुमार
विद्यार्थी व मिडिया से जुड़े कई अन्य गण-मान्य व्यक्ति भी मौजूद थे। इस कवि-गोष्ठी
में 25 से अधिक कवियों ने अपनी रचनाएँ पढी।
आजकल
कविताएँ,गीत,गज़लें बहुत लिखी जा रही हैं।कवि-सम्मेलनों व गोष्ठियों में पढी भी जा
रहीं हैं,लेकिन ऐसी कविताएँ,गीत या गज़लें बहुत कम हैं जो श्रोताओं पर अपना प्रभाव
छोड़ती हैं। कुछ कवि अच्छा लिखते के बावजूद,अपनी रचना को ढंग से पढ नहीं पाते,जिससे
रचना श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाती। प्रियंका राय एक ऐसी युवा कवयित्री है जो
लिखती भी बढिया है और पढती भी बढिया है। इस गोष्ठी में जब उन्होंने अपनी कविता की
निम्नलिखित पंक्तियाँ,अपने ही अंदाज में पढी,तो सभी श्रोता भावुक हो उठे-
’पग-पग
कपट भरी राहों से, अब निकला नहीं जाता
माँ
मुझको भाहों में भर ले,अब तो चला नहीं
जाता’
नरेश
मलिक ने अपनी कविता में नारी की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा-
‘जो
नदी की तरह बहती है
पर
वह-किसी को कुछ न कहती है।
सुजीत
शोकीन का कहना था-
‘जिंदगी
यूँ गुजार दी हमने
चंद
लम्हों पर वार दी हमने’
नथ्थी
सिंह बधेल जी ने श्रोताओं के मन को ’ब्रज की होली’गाकर रंग दिया।
कविता
भारद्वाज ने अपनी कविता में उस दुल्हन की व्यथा को व्यक्त किया जिसकी शादी एक
सैनिक से हुई,जिसे शादी से अगले दिन ही,बार्डर पर ड्यूटी के लिए बुला लिया गया-
‘आई
बारात मेरी धूम-धाम से
बैंड-बाजे
बजे रह गये
‘चार
बातें उनसे मैं कर न सकी’
राम
श्याम हसीन, जिस खूबसूरती से लिखते हैं,उसी खूबसूरत अंदाज में पढते भी हैं।उनके एक
चर्चित गीत की पंक्तियाँ-
‘बिन
तुम्हारे जिन्दगी आधी सी है
गम
भी आधा,खुशी आधी सी है’
शहरी
जीवन की विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए सुशीला शिवचरण ने अपनी कविता में कहा-
‘सटे-सटे
से घर यहाँ,कटे-कटे से लोग’
अपने
अंधे स्वार्थ के लिए कुछ लोग छोटे-छोटे बच्चों का शोषण करते हैं। उन बच्चों की
पीडा को दीपक गोस्वामी ने अपनी रचना में बडी ही मार्मिकता से प्रस्तुत किया-
‘जिनके
हिस्से की मिट्टी बस उनके सपने बोने दो
अपने
अंधे लालच को,बच्चे न भूखे सोने दो’
आज
आदमी जीते जी मर रहा है।उसके जीवन में गम ही गम हैं। राम.के.भारद्वाज ने इस हकीकत
को अपनी कविता में इस प्रकार व्यक्त किया-
‘मेरे
कंधों पर मेरी लाश
है
न अजीब-सी बात’
प्रेमिका
के अपने साजन से मिलने की व्याकुलता को अपनी कविता में ‘विकास यशकिर्ति ने कुछ इस
व्यक्त किया-
‘कुछ
दूरी पर रह गया,जब साजन का गाँव
पायल
गिर गयी टूट कर,लचका मेरा पाँव’
‘सीमा
विश्वास’ ने अपनी कविता में आसमान को छूने की चाह व्यक्त की,तो ‘जितेन्द्र कुमार ने
अपनी कविता में प्रिय को अपने दिल की बात बताने की सलाह दी। जिस कार्यक्रम का
संचालन किशोर श्रीवास्तव जी कर रहे
हों,वहाँ हास्य-व्यंग्य की बौछार न हो, हो ही नहीं सकता। एक गज़ल में उनकी मासूमियत
का अंदाज देखिये-
‘तुमने
मुझको भुला दिया तो मैं क्या करता
गैरों
ने दिल मिला लिया तो मैं क्य करता’
हास्य-व्यंगय
के इसी अंदाज को डा-टी.एस.दलाल ने अपनी रचनाओं में जारी रखा।इस अवसर पर मनोज
मैथली,असलम बेताब,राजीव तनेजा,गजेन्द्र प्रताप सिंह,विनोद पाराशर,बबली
वशिष्ठ,पी.के.शर्मा,शशी श्रीवास्तव,मनोज भारत,दुर्गेश अवस्थी,पंकंज त्यागी,भूपेन्द्र
राघव,संतोष राय, व राजकुमार यादव ने भी अपनी रचनाएँ पढीं।
इस
अवसर पर कार्यक्रम की विशिष्ठ अतिथि डा.शीला निगम का सम्मान भी किया गया। राष्ट्र
किंकर के संपादक व साहित्यकार डा.विनोद बब्बर,साहित्यकार श्याम स्नेही जी व जनता
टी.वी.के श्री कृष्ण कुमार विद्यार्थी जी भी इस अवसर पर मौजूद थे। उनकी कविता की
ये पंक्तियाँ उपस्थित लोगों के जहन में देर तक गूँजती रहीं-
‘आपसे
प्यार हो गया कैसे
ये
चमत्कार हो गया कैसे
प्यार
को मैं गुनाह कहता था
लेकिन
यह गुनाह हो गया कैसे’
रविवार, नवंबर 30, 2014
अंधेरे समय को चीरती-कुमार अम्बुज की कविताएँ
29 नवंबर,2014 को नयी दिल्ली
के’गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान’में ’नव-सर्वहारा सांस्कृतिक मंच’ की ओर से चर्चित
कवि’कुमार अम्बुज’ की कविताओं के एकल कविता-पाठ का कार्यक्रम रखा गया।कार्यक्रम की
अध्यक्षता-डा0कर्ण सिंह चौहान ने की।समकालीन दुनिया के संपादक श्री आनंद स्वरुप
वर्मा तथा श्री शिवमंगल सिंह सिद्धांतकर भी इस अवसर पर मंच पर आसीन थे।
श्री रविन्द्र कुमार दास ने
कवि कुमार अम्बुज का परिचय देते हुए कहा कि-उनके अभी तक पाँच कविता-संग्रह,एक
कहानी संग्रह तथा गद्य की अन्य विधा में लिखी गयी अन्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी
हैं।उनके कविता-संग्रह-
’किवाड़’,’क्रूरता’,’अन्तिम’,’अमीरी
रेखा’ व ’कवि ने कहा’ की कई कविताएं काफी चर्चित रही हैं। देश की कई प्रतिष्ठित
संस्थाओं द्वारा उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
देश
के साहित्यकारों/सांस्कृतिक कर्मियों में’बाबा’ के नाम से चर्चित श्री शिव मंगल
सिंह सिद्धांतकर ने मुख्य अतिथि कवि-’कुमार अम्बुज’ तथा अन्य गण-मान्य अतिथियों का
स्वागत करते हुए कहा कि-कविता मानवता के प्रयायों में से एक है।दर-असल कविता उन
सवालों का जवाब देती है,जिनका जवाब हमें कहीं से नहीं मिलता। बाबा ने आगे कहा कि
अलग-अलग संगठन अंधेरे को चीरने के लिए,अलग-अलग तरह के औजारों का प्रयोग करते
हैं।नव-सर्वहारा सांस्कृतिक मंच कविता को एक औजार के रुप में लेते हुए,अंधेरे को
चीरने का प्रयास कर रहा है।
अतिथि
कवि ’कुमार अम्बुज’ने इस अवसर पर अपनी लगभग 25 से अधिक प्रतिनिधि व चर्चित कविताओं
का पाठ-दिल्ली व उसके आस-पास के क्षेत्रों से पधारे प्रतिष्ठित
साहित्यकारों,पत्रकारों व नवोदित कवियों व कवित्रियों की उपस्थिति में किया।उनकी
कुछ चर्चित कविताएं हैं-’जाँच-पड़्ताल‘,‘भरी बस में लाल साफेवाला आदमी’,‘तुम्हारी
जाति क्या है?’,‘जेब में सिर्फ दो रुपये’,‘नयी सभ्यता की मुसीबत’,’क्रूरता’,‘जो
दर-असल हमारी बहनें थी’,‘कवि की अकड़’ और ’मेरा प्रिय कवि’।
कुमार
अंम्बुज की कविताएँ-बहुत ही सहज व सरल हैं। उनकी कविताओं में एक आम आदमी का दर्द
है जो कभी ’भरी बस में लाल साफेवाला आदमी’ के रुप में मुखर होता है तो कभी’जेब में
सिर्फ दो रुपये’देखकर। नारी की पीड़ा को भी अपनी कविताओं में उन्होंने बड़ी
मार्मिकता से अभिव्यक्ति दी है। कवि के अकड़पन को,बिना किसी लाग-लपेट के,अपनी
कविता’कवि की अकड़’ में बहुत ही सहजता से व्यक्त किया है।
कार्यक्रम
के दूसरे सत्र में-कुमार अंम्बुज से-उनकी कविताओं और उनकी रचना-प्रक्रियाँ को लेकर
प्रश्न किये गये। कवयित्री’अंजु शर्मा ने प्रश्न उठाये कि वे नारी न होते हुए भी,
नारी-पीड़ा को इतनी सहजता से अपनी कविताओं में कैसे व्यक्त करते हैं?आज के समय की वे कौन सी चुनौतियाँ है जिनका कविता
सामना कर रही है? वरिष्ठ कवि श्री मंगलेश डबराल ने कुमार अंम्बुज से
उनकी’रचना-प्रक्रिया’ के संबंध में सवाल किया। उन्होंने बडी सहजता से,कभी
सीधे-सीधे तो कभी कविता के रुप में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दिये।
अंत
में,अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में –डा0कर्ण सिंह चौहान ने कहा कि यह कहना एकदम गलत
है कि पाठक के मन में कविता की जिज्ञासा कम हुई है।केवल कवि ही सभी चीजें तय नहीं
करता,समय भी कई चीजों को तय करता है।आज हमारे कहने और करने में कोई संबंध नहीं रह
गया है। जो कविताएं लिखी जा रही हैं वे सकारात्मक-बोद्य से उपजी कविताएं न
होकर,आक्रोश में लिखी गयी कविताएं हैं।
इस कार्यक्रम की कुछ अन्य तस्वीरें
शनिवार, मई 17, 2014
फेस-बुक मैत्री संगोष्ठी-2014
“फेस-बुक तकनीक का उच्चतम शिखर है। यह एक
ऐसी खिड़की है जिससे विश्वदर्शन किये जा सकते हैं। अब खिड़की है तो ताजी हवा,धूप के
साथ-साथ,धूल,मिट्टी भी आयेगी ही।यदि विवेक से काम लेकर इस खिड़की पर पर्दा लगा
लें,तो अनावश्यक कूड़े-कचरे से बचा जा सकता है।’-ये विचार राष्ट्र किंकर के संपादक श्री
विनोद बब्बर जी ने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर दिल्ली नांगलोई में दिनांक
14-05-2014 को आयोजित एक कार्यक्रम में व्यक्त किये।
‘फेस-बुक-मैत्री-संगोष्ठी-2014’ का
आयोजन-’हम सब साथ-साथ ,’प्रथम क्रिएशन व ’सुरभि’ के सौजन्य से किया गया। इस अवसर
पर देश के कोने-कोने से आये लगभग 40 से अधिक फेस-बुक के माध्यम से जुड़े मित्रों ने
अपने अपने अनुभवों को साझा किया। फेस-बुक से जुडे खट्टे-मीठे अनुभवों को लेकर एक
प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी,जिनमें से पाँच अनुभवों को पुरस्कृत किया गया।
पुरस्कार प्राप्त करने वाले मित्र थे:-
1.संजना तिवारी(आध्र-प्रदेश)
2.पूनम माटिया
3.राम.के.भारद्वाज
4.निवेदिता मिश्रा
5.जगत(दतिया)
इसके अलावा अन्य लगभग 25 फेस-बुक मित्रों को फेस-बुक पर अपनी
सक्रियता बनाये रखने के लिए सह-भागिता प्रमाण-पत्र भी वितरित किये गये। इस अवसर पर
व्यंग्य कविता में सुपरिचित हस्ताक्षर डा.सरोजनी प्रीतम, गजलकार विजय गुरदासपुरी,फिल्म
व धारावाहिक लेखिका श्रीमती रेखा बब्बल भी
उपस्थित थी। डा.सरोजनी प्रीतम ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“व्यक्ति युवा मन
से होता है। कवि हमेशा युवा रहता है। हमारा शब्दों का खेल है।मैंने हमेशा शब्दों
से खिलवाड़ किया है” उन्होंने इस अवसर पर अपनी व्यंग्य कविता
पढी-
लो भी
लो भी
जब ले लिया
तो कहते हैं
लोभी।
मंगलवार, जनवरी 07, 2014
आप के कुमार को नहीं था विश्वास
मेरे मस्तिष्क में विचार आ रहा है, कि कुछ भी सार्वजानिक रूप से कहने से पहले थोड़ा सोच-विचार अवश्य किया करूँगा. वरना मेरी भी भविष्य में कुमार विश्वास जैसी दुर्गति हो सकती है. कवि सम्मलेन में अपने गिने-चुने मुक्तकों व उल-जलूल चुटकुलों के सहारे ख्याति पानेवाले कवि महोदय धर्म को भी अपने चुटकुलों का शिकार करने से बाज नहीं आते हैं. अब अपने हिंदू धर्म के देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने तक सीमित रहते तो ठीक रहता, क्योंकि हम हिंदू इतने सहनशील हैं कि चाहे जो भी हमारी धार्मिक भावनाओं को आहत करता रहे हम इस डर से शांत रहते हैं कि कहीं हमारे क्रोधित होने पर तथाकथित सेकुलर लोग हमें सांप्रदायिकता का मैडल न भेंट कर दे. अब चूँकि कवि कुमार ने एक ऐसे धर्म पर कुछ साल पहले मूर्खता भरी टिप्पणी की थी, जो ईंट का जवाब चट्टान से देने में सिद्धहस्त है, तो उन्हें अपनी करनी का भुगतान तो करना ही पड़ेगा. "आप" के कुमार को विश्वास नहीं हो रहा होगा कि अपने चुटकुलों के कारण उनके सामने जीवन में कभी ऐसी कठिन परिस्तिथि भी आ सकती है. वैसे मैं किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाए जाने के विरुद्ध हूँ. आपके क्या विचार हैं इस बारे में?
शुक्रवार, अगस्त 16, 2013
एंटी रोड रेज एंथम: गुस्सा छोड़
नई दिल्ली: शोभना वेलफेयर सोसाइटी रजि. के तत्वाधान में दिल्ली एंथम और दामिनी एंथम के लेखक गीतकार सुमित प्रताप सिंह ने भारत के 67 वें स्वतंत्रता दिवस पर रोड रेज को छोड़ने का आग्रह करते हुए अपना नया गाना “एंटी रोड रेज एंथम: गुस्सा छोड़” यू ट्यूब पर रिलीज किया है. रोड रेज ने इन दिनों पूरे विश्व में एक गंभीर समस्या का रूप धारण कर लिया है. छोटी-मोटी बात के लिए लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. रोड रेज के कारण कई लोग बेमौत मारे गए हैं और कई परिवार तबाह हो चुके हैं. सुमित के अनुसार वह अपने इस गाने से रोड पर चलने वालों को यह संदेश देना चाहते हैं, कि रोड चलने-फिरने के लिए है न कि लड़ाई-झगड़ा करने के लिए. छोटी-मोटी गलती के किसी के साथ मारपीट या किसी को जान से मारना बिल्कुल भी उचित नहीं है. उनकी राय में जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकते तो भला किसी की जान लेने का अधिकार हमें कैसे मिल सकता है. सुमित ने उम्मीद जताई है, कि उनके इस गाने को सुनकर व देखकर लोग सड़कों पर झगड़ना छोड़ दें तो उनकी मेहनत सफल मानी जायेगी. इस गाने को स्वर दिया है पंकज सोनी ने, इसकी धुन तैयार की है रविन्द्र सिंह रावत व पंकज सोनी ने तथा इसका वीडियो निर्देशन और एडिटिंग की है संजीव शर्मा ने. विशेष बात यह है कि इस गाने में एक ग्यारह वर्षीय बालक जयंत सक्षम ने गिटार बजाकर इसके संगीत में अपना योगदान दिया है. ज्ञात हो कि सुमित प्रताप सिंह इस समय दिल्ली पुलिस की ट्रैफिक यूनिट में तैनात हैं.
नोट: एंटी रोड रेज एंथम सुनने के लिए क्लिक करें http://www.youtube.com/watch?v=SIgRiEs9Yl4 पर...
रिपोर्ट: संगीता सिंह तोमर
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