शनिवार, अप्रैल 20, 2013

शोभना सम्मान समारोह व सामाजिक जागरुकता एवं सोशल मीडिया पर विचार गोष्ठी





नयी दिल्ली के गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में गत 17 अप्रैल 2013 को शोभना वैलफेयर सोसायटी की ओर से सोशल मीडिया से जुडे ब्लागरों,लेखकों व पत्रकारों को सम्मानित किया गया।इस अवसर पर दिये गये सम्मानों को पाँच श्रेणियों में बाँटा गया था।देश के कई राज्यों से पधारे निम्नलिखित व्यक्तियों को इस अवसर पर सोसायटी की ओर  से सम्मान स्वरुप प्रमाण-पत्र व अंग-वस्त्र प्रदान किये गये:-
शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान – 2012:- लोकेन्द्र सिंह राजपूत (ग्वालियर,म.प्र.), डॉ. मनोज कुमार सिंह(उ.प्र.), जेन्नी शबनम (दिल्ली), मीना धर (कानपुर,उ.प्र.), उपासना सियाग (अबोहर,पंजाब),  अन्नपूर्णा वाजपेयी (कानपुर,उ.प्र.), संजीव शर्मा व मनीषा शर्मा (दिल्ली)
शोभना फेसबुक रत्न सम्मान – 2012:- रविन्द्र सिंह (फरीदाबाद,हरियाणा) व योगेश ठाकुर (बंगलौर, कर्नाटक)
शोभना तकनीकि सम्मान – 2012:- आशीष वाजपेयी (उ. प्र.)
शोभना काव्य सृजन सम्मान – 2012:- डॉ. रवि शर्मा (दिल्ली), कैलाश पर्बत (औरैया), ज्योतिर्मयी पंत (देहरादून,उत्तराखंड), दिनेश जांगड़ा (हिसार, हरियाणा), अंकित गुप्ताअंक(मुरादाबाद,उ.प्र.)
पूनम माटिया (दिल्ली), मुकेश कुमार सिन्हा (दिल्ली), वंदना गुप्ता (दिल्ली),
शोभना पत्रकारिता सम्मान – 2012:- संजय सक्सेना (उ.प्र.), गुलशन भाटी (उ.प्र.),  विरेन्द्र कुमार सोनी (रायगढ़,छत्तीसगढ़), किशोर श्रीवास्तव (दिल्ली), राजकुमार अग्रवाल (दिल्ली),  रऊफ अहमद सिददीकी (नोएडा, उ.प्र.), बंशी लाल (दिल्ली) व अजय कुमार ( उ. प्र.)।
      इस अवसर पर सामाजिक जागरुकता में सोशल मीडिया व हिंदी की भूमिका को लेकर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी किया गया।विचार गोष्ठी में राजनीति,पत्रकारिता तथा अन्य सामाजिक सरोकारों से
जुड़े विद्वानों ने अपने विचार रखे।आज के दौर में सोशल मीडिया के महत्व को रेखांकित करते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. एच.सी.एल.गुप्ता, अध्यक्ष पूर्वांचल प्रकोष्ठ (भाजपा) ने कहा  कि आज के माहौल में सोशल मीडिया की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। राष्ट्र-को जोडने में सोशल मीडिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए लेकिन हमारे देश के लगभग सभी भू-भागों में बहुत बडी आबादी द्वारा हिंदी भली-भांति समझी  व बोली जाती है इसलिए राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने के लिए सोशल मीडिया में हिंदी का प्रयोग अधिक से अधिक किया जाना चाहिए।
’राष्ट्र किंकर’ के संपादक डा.विनोद बब्बर ने कहा कि-सोशल मीडिया ने समाज को जागरुक किया है इसका सबसे बडा प्रमाण गांधी शान्ति प्रतिष्ठान का यह भरा हुआ प्रांगण हैं। आज यहां पर जो भी लोग कार्यक्रम में उपस्थित हैं-वे सोशल मीडिया के जरिये ही आपस में एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं।उन्होंने आगे कहा यदि हम स्वयं जागरुक रहे तो सोशल मीडिया समाज को भी जागरुक बना सकता है।

विशिष्ट अतिथि के रुप में आमंत्रित लीपा के चेयरमैन, श्री सुभाष सिंह का कहना था कि सुमित प्रताप सिंह ने विचार-विमर्श के लिए बहुत सम-सामयिक विषय चुना है। फेस-बुक व ट्विटर सोशल मीडिया के बहुत सशक्त माध्यम है।पिछले 10 वर्षों में इन्होंने युवा पीढी को बहुत प्रभावित किया है।राजनीति से जुडे लोगों ने भी इनके महत्व को समझा है।अपने विचार विशेष रुप से युवाओं तक पहुँचाने के लिए-उन्होंने सोशल मीडिया को माध्यम बनाया है।लालू प्रसाद यादव की परिवर्तन रैली के नाम पर की गयी 116 सभाओं की खबरें अखबारों में नहीं हैं लेकिन सोशल मीडिया में वे मौजूद हैं।वोट फार इंडिया के श्री नीरज गुप्ता ने सभी से अपील की कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित करें।
अंत में काव्य सृजन पुरस्कार से सम्मानित व दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर,डा.रवि शर्मा ने सोशल मीडिया से जुडे इतने लोगों को सम्मानित करने के लिए शोभना वेलफेयर सोसायटी का आभार व्यक्त किया। संयोजक श्री सुमित प्रताप का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग जैसे  असंवेदनशील महकमे से जुडे होते हुए भी,वे बहुत ही संवेदनशील व्यक्ति हैं जो अपनी संस्था के माध्यम से पिछले लगभग छ:वर्षों से इस तरह के सामाजिक जागरुकता के कार्यक्रम कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में दिल्ली व दिल्ली से बाहर के,मीडिया व सोशल मीडिया से जुडे 100 से अधिक लोग उपस्थित थे।
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कार्यक्रम की कुछ अन्य झलकियां




मंगलवार, अप्रैल 09, 2013

गाँव व शहर की कविता





6अप्रैल,2013की शाम,नयी दिल्ली के कनाट प्लेस मेंचाँद के जुलाहेशीर्षक से एक काव्य -गोष्ठी का आयोजन किया गया।गाँव व शहरको केन्द्र में रखकर हिंदी व अंग्रेजी में कविताएं पढी गयी।पुरानी व नयी पीढी के कवि/कवियित्रियों ने अपनी कविताओं में गाँव व शहर के वातावरण को जीवंत कर दिया । ‘रति अग्निहोत्री’ के कुशल संचालन व श्री ‘त्रिपुरारी शर्मा’ के संयोजन के अंतर्गत 20 से अधिक रचनाकारों ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की।‘इन्दु सिंह’ ने अपनी कविता में गांव के भोले-भाले लोगों के निश्छल प्रेमको अभिव्यक्ति दी,तो ‘कनुप्रिया’ ने शहर की कठोरता व निर्ममता को कविता का विषय बनाया।‘पूनम माटिया’ की चिंता है कि मशीनीकरण के इस दौर में कहीं आदमी अपनी आदमियत  खोकर,रोबोट में न बदल जाये।आईने के सामने देर तक  खडे रहते हुए महिलाओं को तो अक्सर देखा है,लेकिन आज की युवा पीढी भी आईने पर फिदा है।’मयंक मिश्रा’ की कविता की पंक्तियां थीदेर तक देखता रहता हँ-खुद को आईने में। भाई ‘रवि ठाकुर’ की कविता का शीर्षक था-’गाँव का दिन’। उनकी इस कविता में गांव की प्रात:काल की बेला का एक दृश्य देखिये-
गांव अभी सोकर जगा था
डाली पर पंछी बैठे थे
नाली पर बच्चे बैठे थे।
शहरों में जगह की बहुत कमी है। वे अपना शौक कैसे पूरा करें,जिन्हें पेड.-पौधों से प्रेम है।‘खुशबु’ ने बालकानी में जगह देखी और वहीं पर अपने गमले सजा दिये।‘विकास राणाकी चिंता है कि आने वाले समय में चलता-फिरता आदमी दीवार सा रह जायेगाआनंद’ने अपने गांव के ठंडे पानी के तालाब के किस्से अपनी कविता के माध्यम से सभी को सुनाए।’कृष्ण कान्त’जब कई वर्षों के बाद अपने गांव लौटे तो पुरानी स्मृतियों में खो गये। गांव से शहर की ओर पलायन करते समय मन में गम और खुशी दोनों ही तरह के भाव होते हैं।अनुपमा गर्ग की कविता की इन पंक्तियों का शायद यही भाव है-
’चला था मैं गांव से
आज मन हस रहा है
रो रहा है’
रति अग्निहोत्री पहुंच गयी मुरादाबाद की पीतलनगरी। अपनी कविता में उन्होंने पीतलनगरी के कामगारों के दर्द को बडी मार्मिकता से व्यक्त किया। काव्य गोष्ठी के अंतिम दौर में, अपनी कविता-‘यहां भी कभी गांव था’ लेकर पहुंचे विनोद पाराशर ने,शहरीकरण के प्रभाव में आ रहे गांवों के दर्द को अभिव्यक्ति दी।जिन अन्य कवि/कवियित्रियों ने इस अवसर पर अपनी रचनाएं पढीं,वे थे-मुदिता,प्रकृति,स्वाति चावला,आकांक्षा,अलसर,अरुण व शारिक असीम।
कार्यक्रम की अन्य झलकियाँ

 


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रविवार, फ़रवरी 24, 2013

एक शाम,बेटियों के नाम



नयी दिल्ली,सिरीफोर्ट आडिटोरियम के नजदीकएकेडमी आफ फाइन आर्ट एण्ड लिटरेचरमेंडायलाग्सकार्यक्रम के अन्तर्गत,24 फरवरी,2013 की शाम,एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गयाइस गोष्ठी में  प्रतिष्ठित नवोदित 30 से अधिक कवि कवियित्रियों नेबेटियोंपर केन्द्रित अपनी कविताएं पढ़ी
कार्यक्रम की अध्यक्षता-आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक श्री लीलाधर मंडलोई ने कीउन्होंने इस अवसर पर महाकवि निराला जी की भाव-पूर्ण रचनासरोज-स्मृति के कुछ अंश पढकर सुनायेकार्यक्रम के संयोजक श्री मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा कि समकालीन कविता मेंबेटियोंने अपनी जगह कैसे बनाई है?आज हमें यह देखना है।‘ईश्वरशीर्षक से उन्होंने अपनी कविता भी पढ़ी मंच-संचालन का उत्तरदायित्व संभाला,दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर सुधा उपाध्याय नेउन्होंने बेटियों के प्रति अपने भाव,कविता में इस प्रकार प्रकट किये-
बेटियां स्वयं शुभकामनाएं होती हैं
घर के श्वेत श्याम आंगन को
फागुन में बदल देती हैं
      बेटियों के प्रति प्रेम,भय,शंका,उनके पालन-पोषण के प्रति लोगों की दोहरी मानसिकता तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामनाएं-पढी गयी-लगभग सभी कविताओं का यही भाव था। कुछ नवोदित कवि/कवियित्रियों की कविताओं के भाव तो अच्छे थे,लेकिन कविता-पाठ की कला से अनजान होने के कारण,वे अपनी कविता के मर्म को श्रोताओं तक नहीं पहुँचा पाये। फिर भी,उनके प्रयास की सराहना तो की ही जानी चाहिए-ताकि उनका मनोबल बढ सके और वे कविता के प्रस्तुतीकरण में भी सुधार ला सकें।
      लीलाधर मंडलोई ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में-पढी गयी कविता पर,टिप्पणी करते हुए कहा कि-कविता लिखना और उसे पढना-दोनों अलग-अलग बाते हैं। हमें कविता लिखने के साथ-साथ,उसके पाठ का भी अभ्यास करना चाहिए।कविता से प्रेम करिये,उसके मन को भी पढिये।उन्होंने कहा कि अखबार की खबर और कविता में फ़र्क होता है।पढी गयी कुछ कविताओं में आवेश तो था,लेकिन तरलता नहीं थी।कविता में कवि-मन दिखाई देना चाहिए।

      जिन कवि/कवियित्रियों ने इस कार्यक्रम में अपनी कविताएं पढीं,उनमें से कुछ नाम हैं-विभा मिश्रा,अंजू शर्मा,रुपा सिंह,शोभा मिश्रा,शैलेश श्रीवास्तव,वंदना गुप्ता,कोमल,विपिन चौधरी,ममता किरन,संगीता शर्मा,अर्चना त्रिपाठी,शौभना,,अर्चना गुप्ता,भरत तिवारी,अजय’अज्ञात’,लक्ष्मी शंकर बाजपेयी,उपेन्द्र कुमार,शाहिद,श्री कान्त सक्सेना,राजेश्वर वशिष्ठ,गोकुमार मिश्रा,देवेश त्रिपाठी व अन्य ।


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