दुनिया में अलग-अलग किस्म के लोग पाये जाते हॆं.कुछ हॆं कि खाया-पीया,काम-धंधे पर गये ऒर रात को चद्दर तानकर सॊ गये.बस!यही हॆ उनकी दिनचर्या.न कोई फालतू का लफडा ऒर न ही कोई टॆंशन.समाज में कुछ लोग ऎसे भी होते हॆं जो थोडा लीक से हटकर होते हॆं.वे केवल खाने-पीने,काम-धंधे तक सीमित नहीं रहते,अपितु कुछ ऎसा विशेष काम भी करते हॆं-जिससे समाज में उनकी अलग पहचान बन जाती हॆ.जी हां! मॆं आदमी के शॊक ही बात कर रहा हूं.किसी को शॊक संगीत सुनने का तो किसी को कहानी,कविता आदि लिखने का.कोई अपने इष्ट देवता की भक्ति में ही लीन हॆ. यदि कोई पूछे कि किसी संगीत-प्रेमी को संगीत में,कवि को कविता ऒर भक्त को अपने इष्ट की आराधना में क्या मिलता हॆ?तो इसका उत्तर देना बहुत मुश्किल हॆ.इससे मिलने वाले आनंद को वही समझ सकता हॆ-जो उस तरह का शॊक रखता हॆ.’टिकट-संग्रह’यानि ’फिलॆटली’ भी कुछ इस तरह का ही शॊक हॆ.यह शॊक,कुछ टिकट-संग्रह-कर्ताओं के लिए,केवल एक शॊक मात्र ही नहीं रहा हॆ,अपितु व्यवसाय भी बन चुका हॆ.
यदि डाक टिकटों का इतिहास पलटकर देखें,तो यह लगभग 171 वर्ष पुराना हॆ.विश्व का पहला डाक-टिकट-एक मई,1840 को ग्रेट ब्रिटेन में छपा था.iइसे ’दि पॆनी ब्लॆक’ का नाम दिया गया.जानकारी के अनुसार-इस बचे हुए टिकट की कीमत,आज 3 हजार डालर हॆ.इसी प्रकार,वर्ष 1855 में,स्वीडन में छ्पा’दि थ्री स्कीलिंग यॆलो’ के बचे इकलॊते डाक टिकट की वर्तमान कीमत 11.6 करोड रुपये लगाई गयी हॆ.ब्रिटिश उपनिवेश’गुयाना’ ने भी काफी घटिया कागज पर एक डाक-टिकट छापा था.वर्ष 1980 में,इसकी बोली लगाई गयी-9 लाख 35 हजार डालर.हॆ ना शॊक का शॊक ऒर निवेश का निवेश.जो जितना ज्यादा पुराना व अनुपलब्ध उतना ही ज्यादा कीमती.
अब अपने देश भारत की बात करते हॆं.हमारे यहां डाक टिकटों का प्रारंभ-1 जुलाई,1852 को सिंध प्रांत से हुआ.खास बात यह रही कि सिंध प्रांत में छपी, यह डाक-टिकट गोलाकार थी.इससे पहले विश्व की सभी डाक टिकटें आयताकार ही होती थी.इस टिकट का प्रचलन सिंध प्रांत तक ही सीमित रहा.’सोने के डाक-टिकट’ छापने vवाले देशों में अब भारत भी शामिल हो गया हॆ. ’प्राइड आफ इण्डिया’ नाम से’ कुछ स्वर्ण डाक टिकटों की श्रंखला भारतीय डाक विभाग ने जारी की हॆ.ये डाकटिकटें ठोस चांदी पर सामान आकार में ढाली गयी हॆ,जिनपर 24 कॆरेट शुद्ध सोने की परत चढाई गयी हॆ.25 स्वर्ण डाक टिकटों का यह सॆट 1.5 लाख रुपये का हॆ.आम आदमी को यह मंहगा लग सकता हॆ,लेकिन टिकट संग्रह के शॊकीनों के लिए यह कीमत कोई मायने नहीं रखती.इन टिकटो को जारी करने के लिए,लंदन स्थित कंपनी हालमार्क गुरुप को अधिकृत किया गया हॆ.इन टिकटों को जारी करने का उद्देश्य-भारत की सभ्यता व संस्कृति से जुडी धरोहरों की जानकारी-सम्पूर्ण विश्च को देना हॆ.
दर-असल डाक टिकटों में,हमारी राष्ट्रीय,सांस्कृतिक ऒर ऎतिहासिक पहचान दर्ज होती हॆ.पुराने डाक टिकटों के बारे में यदि यह कहा जाये कि ये हमारी विरासत हॆं,तो अतिश्योक्ति न होगी.डाक टिकटों में पूरा जीवन बसता हॆ.राजनीति,इतिहास,महान व्यक्तित्व,विश्व की घटनायें,भूगोल,कृषि,विज्ञान,पर्वत,सॆनिक,यातायात इत्यादि-जीवन का वह कॊन-सा पहलू हॆ जो इन डाक-टिकटों में मॊजूद नहीं हॆ.यह एक ऎसा शॊक हॆ जिसमें न तो कोई आयु का बंधन हॆ ऒर न ही कोई राष्ट्रीय सीमा.विश्व के किसी भी कॊने में बॆठे दो टिकट संग्रह कर्ता न केवल टिकटों का आदान-प्रदान कर सकते हॆं,अपितु अच्छे मित्र बनकर एक-दूसरे के देश की सभ्यता व संस्कृति से परिचित भी हो सकते हॆं.
अब सवाल उठता हॆ कि आपको यह शॊक तो हॆ,लेकिन इसे पूरा कॆसे किया जाये?तो चिंता मत कीजिए,इसका समाधान भी हॆ.मानते हॆं कि इन्टरनेट के इस जमाने में,चिट्टी-पत्री का प्रचलन,अब पहले जॆसा नहीं रहा-लेकिन जो अनुभूति किसी प्रिय के हाथ से लिखे पत्र में होती हॆ वह ई-मेल या एम.एम.एस.में कहां.पहले तो,जो भी पत्र आपके पास आये या आपके किसी खास के पास आये, उसके लिफाफे को इधर-उधर न फॆंकर,संजोकर रखिये.इसी तरह का शॊक रखने वाले-किसी पुराने खलीफा(टिकट-संग्रह कर्ता) को अपना मित्र बनाये वह इस संबंध में उसका मार्ग-दर्शन लें.भारतीय डाक विभाग का ’फिलॆटलिक ब्यूरो’ आपके इस शॊक को पूरा करने के लिए,हमेशा तत्पर हॆ.आपको सिर्फ करना यह हॆ कि ’फिलॆटलिक ब्यूरों’ द्वारा अधिकृत किसी भी डाकघर में अपना एक खाता खोलना हॆ,जिसमें एक निश्चित राशी जमा करनी हॆ.जब भी कोई नई डाक-टिकट,कवर या अन्य सामग्री जारी की जायेगी,आपको घर पर ही, पंजीकृत डाक से,बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के भेज दी जायेगी.देश के 59 अधिकृत प्रधान डाकघरों में,यह विशेष खाता खोलने की सुविधा उपलब्ध हॆ.इस संबंध में अधिक जानकारी आप भारतीय डाक विभाग की वेब-साईड- www.indiapost.gov.in से या फिर निदेशक(फिलॆटली),डाक भवन,संसद-मार्ग,न.दि-110001 से भी प्राप्त कर सकते हॆं.
डाक विभाग’टिकट-संग्रह’ के इस शॊक को बढावा देने तथा लोगों में इसके प्रति जागरुकता पॆदा करने के लिए समय-समय पर तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करता रहता हॆ-जिनमें डाक-टिकट प्रदर्शनी,बच्चों की क्विज व चित्रकला-प्रतियोगिताएं शामिल हॆं.इन प्रतियोगिताओं में शामिल प्रतिभागियों को न केवल नगद पुरस्कार अपितु प्रमाण-पत्र भी दिये जाते हॆं.पिछले दिनों विभाग की ओर से जिला स्तर पर इस तरह की कई प्रतियोगिताएं एवं प्रदर्शनियां आयोजित की गयीं,जिसमें स्कूल के बच्चों व टिकट-संग्रह कर्ताओं ने बढ-चढकर हिस्सा लिया.इसी क्रम में सातवीं राज्य स्तरीय फिलॆटली प्रदर्शनी का आयोजन 22 से 24 जनवरी,2012 को’धरोहर-2012’ के नाम से’राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्र,न.दि-1’में किया जा रहा हॆ.इस प्रदर्शनी का उदघाटन-श्रीमती मंजुला पराशर-सचिव भारत सरकार,डाक विभाग,संचार ऒर सूचना प्रॊद्यॊगिकी मंत्रालय करेंगीं.
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भारत की राजधानी हॆ-यह दिल्ली.भारत का लघु-रुप हॆ यह दिल्ली.अनेकताओं में एकता का शहर हॆ-दिल्ली . दिलवालों का शहर हॆ यह दिल्ली.पाश्चात्य व पश्चिमी संस्कृति का मिश्रण हॆ-यह दिल्ली.भारतीय राजनीति का अखाडा हॆ यह दिल्ली.न जाने कितनी बार उजडी व बसी यह दिल्ली.इस दिल्ली शहर के साहित्यकारों,पत्रकारों व ब्लागरों का एक सामूहिक मंच हॆ-यह ’दिल्ली ब्लागर्स एसोशिएशन.
बुधवार, जनवरी 18, 2012
सोमवार, जनवरी 16, 2012
उड़न तश्तरी में उड़ते समीर लाल
प्रिय मित्रो
सादर ब्लॉगस्ते!
इंसान की शुरू से ही दूसरे के घर में ताक-झाँक करने की आदत रही है. जब हमने विज्ञान में प्रगति की तो हमारी पृथ्वी के वैज्ञानिक अपने ग्रह को छोड़ दूसरे ग्रहों में ताक-झाँक करने लगे. "तुम डाल-डाल हम पात-पात" की कहावत को चरितार्थ करते हुए दूसरे ग्रहों के वासी, जिन्हें हम एलियन कहते हैं, भी समय-समय पर अपनी-अपनी उड़न तश्तरी में सवार हो हमारी पृथ्वी पर ताक-झाँक करने आते रहते हैं. एक दिन ऐसे ही एक उड़न तश्तरी धरती पर उतरी, तो उस समय वहाँ दो हिंदी ब्लॉगर टहल रहे थे. उड़नतश्तरी से कुछ एलियन धरती की जाँच-पड़ताल करने निकले, तो इन दोनों ब्लॉगरों ने उन्हें नींद की दवा डालकर बनाया हुआ सूजी का हलवा खिला दिया. जब बेचारे एलियन नींद में मस्त हो धरती पर आराम फरमाने लगे, तो ये दोनों ब्लॉगर उड़न तश्तरी पर सवार हो पूरी दुनिया की सैर करने लगे. उनमें से एक ब्लॉगर उड़न तश्तरी में उड़ते-उड़ते जब बोर हो गये, तो नीचे उतर नुक्कड़ पर बैठकर पंचायत करने लगे. दूसरे ब्लॉगर अब तक उड़न तश्तरी पर सवार हो इधर से उधर घूम रहे हैं. जी हाँ हम बात कर रहे हैं उड़न तश्तरी वाले समीर लाल जी की .
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शनिवार, जनवरी 14, 2012
सुरेश यादव की चिमनी पर टंगा चाँद
सादर ब्लॉगस्ते!
आप सभी को अपने परिवार, रिश्तेदारों, पड़ोसियों व सभी दोस्तों-दुश्मनों के साथ बीती लोहड़ी और आगामी मकरसंक्रांति की ह्रदय से हार्दिक शुभकामनाएँ. साथियो क्या आप जानते हैं कि दिल्ली नगर निगम कब आस्तित्व में आया. नहीं जानते? चलिए हम किसलिए हैं? दिल्ली नगर निगम संसदीय क़ानून के अंतर्गत 7 अप्रैल, 1958 में आस्तित्व में आया. दिल्ली के पहले निर्वाचित मेयर थीं अरुणा आसफ अली और लाला हंसराज गुप्ता ने प्रथम मेयर के रूप में अपनी सेवा दी.आज आपकी मुलाक़ात करवाने जा रहे इसी दिल्ली नगर निगम में अतिरिक्त उपायुक्त पद पर कार्यरत सुरेश यादव जी से. जो दिल्ली नगर निगम की सेवा करते हुए हिंदी साहित्य की सेवा में भी कर्मठता से लगे हुए हैं.
बुधवार, जनवरी 11, 2012
ब्लॉग शास्त्र पढ़ते संतोष त्रिवेदी
प्रिय मित्रो
सादर ब्लॉगस्ते!
आप यह भली-भाँति जानते होंगे कि हिन्दू धर्म में कितने वेद हैं. क्या नहीं जानते? चलिए हम बता देते हैं. वेदों की संख्या कुल चार है. ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद. ऋगवेद, यजुर्वेद व सामवेद को वेदत्रयी के नाम से संबोधित किया जाता था. इतिहास को हिन्दू धर्म में पंचम वेद की संज्ञा दी गई है. प्राचीन काल में जो ब्राम्हण जितने वेदों का ज्ञान प्राप्त करता था उसके नाम के पीछे उसी आधार पर चतुर्वेदी, त्रिवेदी व द्विवेदी आदि उपनाम लगाए जाते थे. आज हम जिन ब्लॉगर महोदय से मुलाक़ात करने जा रहे हैं वह भी त्रिवेदी उपनाम को धारण किये हुए हैं. अब यह तो ज्ञात नहीं कि उन्हें तीन वेदों का ज्ञान है अथवा नहीं, किन्तु ब्लॉग शास्त्र को वह भली-भाँति पढ़ रहे हैं.
रविवार, जनवरी 08, 2012
शोभना वैलफेयर ने बाँटे गर्म कपड़े
दिल्ली शहर में ठण्ड का भयानक रूप देखते हुए शोभना वैलफेयर सोसाइटी ने गरीबों को गर्म कपड़े वितरित करने की योजना बनाई तथा आज दिनांक ८ जनवरी, २०११ को गरीबों को गर्म कपड़े वितरित किये ताकि ठण्ड से किसी गरीब की जान न जा पाए.
गुरुवार, जनवरी 05, 2012
भोले से डाक बाबू विनोद पाराशर
प्रिय मित्रो
सादर ब्लॉगस्ते!
प्राचीन काल से ही लोगों के संदेश को लाने और ले जाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय किये जाते रहे हैं. पहले घोड़ों के द्वारा डाक इधर से उधर पहुँचाई जाती थी. प्रेमी अपनी प्रेम पातियों को अपने प्रीतम तक पहुंचाने के लिए कबूतरों का प्रयोग भी करते थे. गुप्त संदेशों को शीघ्रता से भेजने के लिए समय-समय पर बाजों की सहायता भी ली जाती रही. धीरे-धीरे प्रगति हुई और संदेशों को हवाई जहाज में भी उड़ना पड़ा.फिर कंप्यूटर महाराज आये और इन्टरनेट का जाल फैंका और अब पत्रों का स्थान कम्प्यूटरी पत्रों ने ले लिया.किन्तु आज भी पारंपरिक डाक व्यवस्था का महत्त्व कम हुआ है और न ही डाकिया बाबू का.
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शनिवार, दिसंबर 31, 2011
ब्लॉग जगत के मंगल पांडे ठाकुर पद्म सिंह
प्रिय मित्रो
सादर ब्लॉगस्ते!
अंग्रेजी नव वर्ष का आगमन हो चुका है इसलिए अंग्रेजी में ही शुभकामनाएं स्वीकारें। "हैप्पी न्यू इयर टु यू।" वैसे हम हिन्दुस्तानियों का नव वर्ष 22 मार्च, 2012 से आरम्भ होगा। शक संवत, जो कि 78 ईसवी से आरंभ माना जाता है, को कुषाण सम्राट कनिष्क ने आरम्भ किया था किन्तु शक शासकों द्वारा अधिक प्रयोग किये जाने के कारण इसे शक संवत के नाम से जाना जाने लगा। इसमें चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आसाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ व फाल्गुन नामक बारह मास होते हैं। इसलिए आनेवाले शक संवत, 1934 की शुभकामनाएं भी आपको स्वीकार करनी पड़ जायेंगी। आगे पढ़ें...
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